Friday, July 13, 2018

2. Daily 10-point Recknor

Daily reckoner 1. Daily planning, weekly and monthly, quarterly. 2. 7 habits 1. Proactivity 2. End in Mind (planning) 3. Prioritize,,,,,,, 4. Think Win win 5. First understand, then understood 6. Synergize (team building) 7. Sharpening the Saw ×××××××××××÷
1. आत्म विकास: आत्मविकास से अर्थ है कि अपना विकास: शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक और इसके लिए अभी मुख्य आधार एक 'पुस्तक सात आदतें' को बनाया है। इसके अतिरिक्त ठेंगड़ी जी की पुस्तक कार्यकर्ता दिमाग में रखने लायक है और कार्यकर्ताओं के बीच में उसी को लोकप्रिय करना चाहिए। बाकी के 9 बिंदु तभी संभव होंगे अगर हम अपना विकास ठीक से प्रक्रिया गत करेंगे।
2. अपना गट: इसका अभिप्राय है की हर कार्यकर्ता को कुछ व्यक्ति ऐसे चुनने चाहिए जो उसके गट के सदस्य हैं। यह भौगोलिक निकटता व संबंधों की निकटता के आधार पर चुनने का काम होगा। इन कार्यकर्ताओं के 4 पक्षों की और उसे ध्यान देना होगा। पहला उसका विकास करना। उसकी स्वदेशी की समाज उसके जीवन के बारे दृष्टिकोण अच्छा हो। दूसरा काम उसकी सक्रियता बढ़े और सक्रियता के आधार पर कुछ प्रवास करना नित्य प्रति कितना समय लगाता है और इसी प्रकार का साप्ताहिक हिसाब किताब भी रखना। तीसरा बिंदु उसका एक विचार केंद्र या वलय जिसे हम स्टडी सेंटर भी कहते हैं वह चलाने की क्षमता और चलाने का अभ्यास बढ़ना चाहिए। चौथा बिंदु है उसके दुख सुख में सहायक होना। 

मेरे पास देश के हर प्रांत के कार्यकर्ताओं के ऐसी सूची बनाई गई है जिनका वह विकास कर सकें। उनकी पूछताछ भी मैंने करनी शुरू की थी परंतु जब तक हुए लोग आगे अपना घट नहीं बनाएंगे मैंने दूसरी पीढ़ी नहीं चलेगी तो यह समझा नहीं जा सकता कि उनका काम शुरू हुआ है। ऐसा बहुत ही कम  हो सका। पहली श्रेणी के कार्यकर्ताओं में लगभग 15-20 लोगों के गट 15-20 लोगों के गट बनवाये जो 300 के लगभग संख्या मानी जा सकती है। ऐसा लगता है कि इसमें मेरे गट के सबसे प्रमुख व्यक्ति की मानसिकता नहीं बनाई जा सकी और इस विषय पर कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी। इस प्रक्रिया को फिर भी आगे बढ़ाना चाहिए।
3. प्रवास समीक्षा व कार्यक्रम: हमने अपने प्रवास की समीक्षा आगामी कार्यक्रमों का हिसाब किताब और केंद्रीय टोली के लोगों की उनका प्रवास आदी बनाना उसकी समीक्षा करना आवश्यक है। अभी हमने कभी भी कार्यकर्ताओं के प्रवास के बारे में पूछा नहीं है और ना ही बनवाने में सहायता की है। अभी श्री सुंदरम जी का प्रवास ठीक चलता है बाकी तो बहुत ही कम हो पाता है। इसी प्रकार से पिछले चार-पांच महीनों में हमने जो अलग बैठ कर के वृंदावन या कहीं और पर समीक्षा करते वह कर्म भी समाप्त है यद्यपि उसकी भरपाई हम और ढंग से भी करते हैं। प्रभास शुरू करने से पहले मुझे स्वयं सोचना चाहिए कि अगले प्रवास में आत्मिक समीक्षा के लिए कब का समय निकाला गया है और उस को आधार बनाकर के सब आंकड़े जुटाने चाहिए।
4. स्वदेशी मेला व लघु वित्त वितरण: यह तो कार्य स्वदेशी मेला लगाने का अपने काम के विस्तार के लिए बहुत आवश्यक फीचर है। लगभग 150 मेले अभी तक लगे होंगे जोोकि इस हिसाब से बहुत ही कम है। हमें चाहिए कि हर प्रांत में कम से कम एक मेला अवश्य रखें। पिछले दिनों जब आत्मनिर्भर भारत की बात हमने करनी शुरू की थी तो जिले में एक मिले की बात थी आई थी। इसी प्रकार लघु वित्त यानी माइक्रोफाइनेंस वितरण करने का काम विदेश में बहुत महत्वपूर्ण है और उसके कारण से कार्यकर्ताओं का समूह बहुत अच्छा खड़ा हुआ है अगर इस को आगे बढ़ाना है तो यह समीक्षा का काम लगातार चलना चाहिए। इसके लिए एक दो व्यक्तियों को अलग से भी लगाना चाहिए।
5. कार्यालय : कार्यालय का काम पिछले 2 महीने से मैंने चिंता करनी शुरू की है क्योंकि विशेष रूप से पूर्णकालिक धन संग्रह एवं कार्यालय तीन चीजें मेरे जिम में आई थी और इस काम का महत्व भी है। चलिए एक व्यक्ति अनुराग जरूर टूटा है जो छोटे-मोटे व्यवस्था इस नाते कर सकता है लेकिन मंदिर समिति की बैठक भी आगे नहीं बढ़ी है।


1. 100 पूर्णकालिक: यह एक बहुत महत्त्व का काम है और उसके लिए मात्री संगठन से 10 लाख की सहायता भी हर साल प्राप्त होती है । यह कहां का घर होता है जिसमें प्रचारक भी एवं पूर्णकालिक अन्य भी शामिल है तो कई काम बहुत अच्छे हो सकते हैं और विशेष रूप से 50 इकाइयां बनाने का काम तो इन्हीं के द्वारा निर्भर होगा। इसके लिए हमने प्रचारकों को प्रेरित किया है। एक विचार एजुकेटर का था जो बड़े जोर शोर से शुरू किया और चुपचाप ठंडा पड़ गया। उसकी भी समीक्षा करनी चाहिए। उसकी भी समीक्षा होनी चाहिए परंतु उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है इस पर हमेशा ध्यान देना और जो वर्तमान में पूर्णकालिक 4:00 के लगभग मध्यप्रदेश में तीन दिल्ली में और इसी प्रकार से अन्य प्रदेशों में भी जो सक्रिय हुए हैं उनकी लगातार देखभाल और उनके विकास का एक नक्शा तय करना चाहिए।
2. युवा शक्ति सक्रियता : इस बारे में बहुत ज्यादा विचार नहीं हो सका हां इतना प्यार हुआ है कि हर इकाई पर किसी न किसी युवा को युवा प्रमुख भी बनाना चाहिए। पहले बहुत से कार्यक्रम इस बारे में सोचे थे कि जैसे महिला सम्मेलन होता है और कोशिश की जाती है कि उसमें महिलाएं ही अग्रणी भूमिका निभाएं उसी प्रकार से हमें हर प्रांत के अंदर कॉलेज विद्यार्थी और युवा का कार्यक्रम भी करना चाहिए जिसमें 19 से 39 साल के या 30 साल के युवा जो देश में 37 करोड़ हैं उनको सक्रिय करना है। सतीश जी की पुस्तक इग्नाइटिंग का यूथ पावर उसका स्वरूप ही देखना चाहिए और उसको जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
3. शोध:  इसके बारे में अधिकांश गतिविधि अभी शोध केंद्र की स्थापना तक सीमित है परंतु साथ ही साथ जो वर्टिकल्स तैयार किए गए थे उन पर काम करना और मास में एक बार इस नाते बैठना भी आवश्यक है। यह काम बैठकर करने का है और मुझे ही करना है ऐसा बताया गया है।
4. 50 केंद्रों की सक्रियता: मानते हैं की छोटी 3 प्रांत 48 संघ के हैं और उसी आधार पर हमको अपने प्रांत बनाने हैं। इसके अतिरिक्त सात आठ देशों का काम भी हमको देखना है। इस प्रकार से 13 तारीख + 7 यह 50 संख्या और इन पर एक रानियां उन की टोलियां बन जाए गोलियों के अंदर तालमेल और उनकी सक्रियता करना आवश्यक है। अभी जब हिसाब लगाते थे तो 23 प्रांत एकदम निष्क्रिय थे यह दोनों बिहार और तेलंगाना इस प्रकार से यह प्रांत है 5 से 75 निष्क्रिय रहते थ
लेकिन अब वो स्थिति कम होती जा रही है 

5. उत्तर क्षेत्र। उत्तर क्षेत्र के 5 प्रांतों पर सर्वाधिक सक्रियता रहनी चाहिए और उसमें भी विशेष रूप से हरियाणा हमारा रोल मॉडल बनना चाहिए। इस प्रांतों में हमारी जान पहचान भी है और एरिया इन्फ्रेंस भी है। बाकी जगह एरिया ऑफ कंसर्न है अतः हम कितना भी काम बढ़ाना चाहे यहां पर हम बढ़ा सकते हैं । थोड़ी दिल्ली की पहले समस्या थी वह भी अब लगभग समाप्त हो गई है और इस काम को हम आगे बढ़ा सकते हैं।

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